जरा सोचिए, ज्यादा नहीं आज से देढ दशक पहले हमारी टेलीविजन की दुनिया कहां थी। अगर आपने सोच लिया हो तो, आपकी आंखो में इक्का दुक्का चैनलो की तस्वीर ही उभरती होगी, दूरदर्शन जी टीवी वैगरह -वैगरह। पर अभी अपने घर में मौजूद टीवी सेट की रिमोट खंखाले तो सैकड़ों चैनलो के सुची हाजिर हो जायेंगी। मुझे याद है वो दिन जब दूरदर्शन पर रविवार को दिखाए जाने वाला चित्रहार और शाम को फिल्म देखने के लिए घंटो इंतज़ार करना पड़ता था। पिक्चर गाना कैसा भी हो, पर देखने की ललक और लालसा कम होने का नाम नहीं लेती थी। कोई भी एपिसोड बेहद लजीज दिखता था और देखने की तड़प हरवक्त जिंदा रहती थी। मम्मी पापा की कितनी चैतावनियां, डांट, फटकार को भी ताक पर रखकर , देखने का जूनुन कम नहीं होता था। मानो जिंदगी का फलसफा, उस टेलीविजन के पर्दे में ही समां गया हो....गुजरे जमाने के वो बाते वक्त की धुंध में गुम तो नहीं हो पायेंगे, पर इसकी यादो का कारवां त उम्र साथ चलेंगा। दरअसल चैनलो
की बाढ में अब मुसिबत ये है कि कौन सा चैनल देखा जाए पिक्चर, गाने और न्यूज के कईयो चैनल मौजूद है। जो चौबिस घंटे चिखते चिल्लाते है....चारो पहर उनकी बकबक, गपशप की आवाजे गल्ली मुह्ल्लो और उंची उंची इमारतो में सुनाई पड़ती है। इनका शोर तले सन्नाटा अब तलाश करने की ज़रूरत महसूस होने लगी है। इसके साथ ही चिंता वाली बात ये है कि जो भारतीय समाज पर्दे के दायरे में रह कर अपना जीवन गुज़र बसर करता था, वही इन चैनलो को ज़रिए पश्चिमी देशो की अंधाधुध नकल का पर्याय बनता जा रहा है। चैनलो में दिखाए जाने वाले धारावाहिक हमे मंनोरजन तो मुहैया करा रहे लेकिन हमारे कुटुंबो को एकल परिवारो में भी तब्दील कर रहे है। पहले भी सास बहु की लड़ाईयो घर के चारदिवारी में सुनाई पड़ती थी, पर आज इसकी गुंज सड़क और थाने के चौकियों में भी सुनाई पड़ती है। इसके चलते समाजिक तानाबाना, संस्कृति और हमारी भाषा भी चरमरायी है। फक्र, आनबान, शान ओ शोकत की दीवार भी जर्जर हुई है। कोई शक ओ सुबह नहीं है कि चैनलो ने लोगो को जागरूक किया, उनके ख्वाबो को हकीकत में बदलने की तरकीब सुझाई, उनके हक हकूक की बात बतायी, देश दुनिया की तमाम जानकारियां परोसी, हुकूमत की गड़बड़ियों को उजागर किया। लेकिन इसके साथ ही नंगापन, ग्लैमर और गंदे गानो की ऐसी बयार भी बहायी है। जिसके मोहपाश में छोटे छोटे बच्चे भी आ गये है। फूहड़ता सारी हदो को लांघने की दहलीज पर आ खड़ा है। इसका उदाहरण हाल ही में ख़त्म हुए बीग बॉस को कौन भूल सकता है, पाकिस्तानी अभिनेत्री वीणा मलिक और अश्मित पटेल के बीच पनपे प्यार और कामुक दृश्यो ने गली मुहल्लो तक चर्चाओ से मुहाल कर दिया । लगता है इस तरह के प्रोग्राम बाज़ार के दबाव में टीवी को और फूहड़ता की दुनिया में ले जाना चाहती है । इसके साथ ही सवाल ये भी उभरता है कि क्या बाज़ार का दबाव टीवी पर और बढेगा। और इस प्रेशर की वजह से क्या टीवी में और नंगेपन आय़ेगा । फिलहाल मुझे तो इसका समाधान क्या होंगा मालूम नहीं है । लेकिन उम्मीद है दर्शक ही इसका हल निकालेंगे और माकूल जवाब देंगे।






