Monday, 21 February 2011

आरूषी+नीरूपमा = कातिल कौन ?






एक थी आरूषी और एक थी निरूपमा, इनकी मौत की खबरे अभी भी अखबारो और न्यूज चैनलो मे
देखने -सुनने को मिलती रहती है...दिल को दहला देने वाली ये मैत आज भी लौगो के बदन पर सिहरन पैदा करती है। दरअसल इनके मौत का असली कातिल कौन है। ये सवाल उलझे हुए धागें
के मानिंद आज भी उलझे हुए है। दिल्ली में रहने वाली स्कुली छात्रा आरूषी, जिसने जिंदगी से उम्मीदे, उमंग, उल्लास की ख्वाहिशे पाली थी। इन नन्ही सी प्यारी सी बच्ची की आंखो इन बातो को बखूबी बंया करती थी....यकायक बेदर्दी से की गयी उसकी हत्या ने उसके सारे सपने बिखेर दिए। देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई ने भी इस बच्ची के कातिल को पकड़ने में मजबूर और नाकाम दिखई पड़ी। उसने अपने हाथ खड़े कर दिए। अपनी क्लोजर रिपोर्ट में उसने हत्या का शक आरूषी के मम्मी पापा राजेश और नुपूर तलवार पर ही जता डाला। वही झारखंड के कोडरमा की रहने वाली नीरूपमा पाठक पेशे से पत्रकार थी, दिल्ली में वो बिजनेस अखबार के लिए काम करती थी, नीरूपमा का कसूर महज इतना था कि उसने अलग जाति के लड़के से प्यार किया। खामिजया उसे जान गंवाकार इसकी कीमत चुकानी पड़ी। नीरूपमा की मौत पर भी रूढीवादी मानसिकता की चादर औढे, उसके परिवार वालो पर गया, लेकिन असली कातिल कौन है, यह अभी भी पहेली बनी हुई है । अभी तक न तो कातिल न तो आरूषी का मिला और न निरूपमा का। निरूपमा मामले में ऑनर किलिंग से इंकार नहीं किया जा सकता। पर सवाल जहन में उभरता कि आखिर कातिल कौन है....क्या कानून के हाथ इन मासूमो के ह्तयारो तक कभी नहीं पहुंचेंगे। इस पर पर्दा क्या यूहीं पड़ा रहेंगा या फिर हमारी जांच एजेंसिया कातिल को ढूंढने में नकाबिल है। इस मामले में कानून की जांच और किंतु परंतु की बजाए परिवारों के बीच आपसी विसंगतियां झूठी
शान शोकत और रूतबा ज्यादा दिखाई पड़ता है.। जो इन बेटियों को वक्त से पहले मौत की आगोश में ले गये। बार बार चैनलो के हल्ला करने और अखबारो के हैडलाइंस से आऱूषी और निरूपमा के हत्यारो को पकड़ने की मुहिम में ताकत मिलती है....देश का आम आदमी भी सड़क पर इसके गुनहगारो को जंजीरो में जकड़वाने में बेताब दिखता है। पर तल्ख हकीकत यही है की आरूषी यदी दिल्ली के उंचे खानदान से नाता नहीं रखती, नीरूपमा दिल्ली की प्रतिष्ठित अखबार की पत्रकार नहीं होती, तो शायद ही उनकी मौत पर इतने बवाल , उबाल और सवाल उठते। और न हीं इंडिया गेट में मोमबतियां जलाने के लिए गर्मजोशी से लोगो को हूजुम उमड़ता। राजधानी से हज़ारो किलोमिटर दूर गांवो में अभी भी कितनी आरूषी और नीरूपमा की निर्मम ह्त्या की जा रही है। लेकिन इसपर
कोई भी शोर नहीं मचाता, मीडिया को भी इसकी खोजख़बर लेने की परवाह नहीं। और न पुलिस
प्रशासन , हमारे हुक्मरान और न ही आम आदमी को इससे सरोकार रखने की दिलचस्पी है। वक्त
ने कई भंयकर त्रासदियों को लील लिया और अबूझ पहेली बनाकर छोड़ दिया। कितनी मौत आज भी रहस्त की चादर ओढे हुए है, उनके मुकदमे की फाइल आज भी कचहरी में यू ही न्याय के इंतजार में धूल फांक रही है, कितने गवाह काल के गाल में समा गये, पर कातिल कौन है आज भी
इसकी तलाश जारी है...क्या यह काले अतीत का किस्सा आरूषी और निरूपमा पर भी दुहराया जायेंगा। सोच कर डर लगता है,काश ऐसा न हो, उनके कातिलो को कड़ी से कड़ी सजा मिले, ताकि फिर इन बच्चियों को मारने की हिम्मत और हिमाकत कोई दरिंदा न करे....उम्मीद है इन निर्दोष बेटियों की मौत से इस वतन की हज़ारो आरूषियों और निरूपमा की जिंदगी बचेगी। और उनके खुशगवार जीवन की राह बनायेंगी।

No comments:

Post a Comment