इक्कसवी सदी का पहला दशक खत्म करने के बाद , जनवरी महीने में अपने घर झारखंड गया...लंबा सफर तय करने के बाद तकरीबन आठ महीने बाद अपने घर पहुंचने पर बेहद अच्छा महसूस कर रहा था । पर दिल में जो ख्वाहिशे लेकर आया था , वो यहां आकर डर और भविष्य की चिंताओ में तब्दील हो गई। घर में सूकुन के पल गुजारने के दौरान जो मेरी आखो ने देखा, वो बेहद दर्दनाक और दिल को चोट पहुंचाने वाला रहा । उस कड़कड़ाती ठंढ की सुबह में कभी नहीं भूल सकता। उसकी यादे दिल को कचोटती है और कहती है क्या जिंदगी वाकई इतनी कठीन है। सुबह सुबह में घर के बाहर दरवाजे से निकला ही था कि , सर्दी में दो मासूम बच्चे , जिनकी उम्र लगभग
बाहर तेरह साल की रही होगी...उनका मासूम चैहरा , कटकटाते दांते , बदन पर पतली से कमीज और बोलती आंखे सर्दी की कहानी सबकुछ बंया कर रही थी । वो बोलने में हिचक रहे थे, तो मैने ही बोलने की जहमत उठायी,। उन बच्चो ने कहा कि वो स्वेटर और साल लेने आए है। जो मेरी माँ ने उनसे देने का वादा किया था । स्वेटर , साल मिलने के बाद उनके चैहरे की चमक देखने वाली थी। माँ से पूछा तो मालूम पड़ा इनके पिता पास के ही मोड़ पर पान की गुमटी है....जिनके भरोसे ही उनकी जिंदगी गुजर बसर होती है। उनके पास इतना पैसा नहीं वो इन बच्चो को तालिम दे सके और ठीक ढंग से परवरिश कर सके। सुबह इन बच्चो से वास्ता हुआ तो शाम दो आदिवासी बच्चो से मुलकात हुई। जिनका इस दुनिया मे कोई नहीं है। ये दोनो भाई अनाथ है। इन दोनो भाईयो की कहानी भी दिल को रूलाने वाली थी। तेरह चौहद साल के ये बच्चे उम्र से पहले जवान हो गये थे। बस दो वक्त की रोटी की जुगा़ड़ के लिए। पूछने पर मालूम पड़ा कि इनके माँ बाप इस दुनिया में नहीं है। साल भर पहले बिमारी से इनकी मौत हो गई थी । इन दोनो भाईयो का कहना था कि
उनकी जिंदगी बचाई जा सकती थी, लेकिन पैसो की किल्लत ने उन्हें वक्त से पहले काल के गाल में समाना पड़ा। इन दोनो भाईयो में बड़ा भाई ट्रक में हेल्पर और छोटा रोज मज़दूरी करके अपनी जिंदगी बसर करता है। इन बच्चो से मिलने के बाद , मै अंदर से बेहद उदास महसूस कर रहा था, शायद इनके लिए कुछ कर पाता । हालांकि इन उदासियों के बीच मेरे जहन में बार बार सवाल भी उठ रहा था कि इन बच्चो के अंधियाले भविष्य के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या सरकारे, इनके
लिए बनाई गई तमाम कमिटिया , कल्याण मंत्रालय , एनजीओ महज कागजो में ही काम कर रही है। क्या इसके बनने के एक दशक गुज़र जाने के बावजूद , इस राज्य के जमीनी हालात में तब्दीलियां नहीं आय़ेंगी ,,,क्या इस राज्य की हथेली में तकदीर बदलने की रेखाए ही नहीं बनी। सोच कर दिल पसिजता है लेकिन पीछे झांकता हुं तो फिर वही गुप्प अंधेरा ही नज़र आता है। हु्क्मरानो के के करोड़ो अरबो के घोटाले, अपने फायदे के लिए बनाई बिगाड़ी गई सरकारे और भ्रष्टाचार की लगातर मैली होती गंगा में फंसते अफसर नेताओ की कतारे । दरअसल ये ऐसे किस्से है जो जिनपर लगाम लगाने की बजाए , इसका सूची लंबी ही होती जा रही है। दुनिया झारखंड के बारे में काफी कुछ पढ सुन रखा है। घपले घोटले, गरीबी, समाजिक कुरितियां से भरे पड़े अखबार और टीवी चैनलो के सहारे उन्हें ये खबरे देखने सुनने को मिलते है। पर तल्ख हकीकत यही है कि यहां के लौग बहुत सीधी साधे , भोले भाले और नीरीह है। झारखंड में शहरो के अलवा उन सूदुर गांवो और जंगलो में भी नीरीह लोग बसते है। जो खुशगवार जिंदगी जिदंगी जिने की अभी भी ख्वाहिश पाले हुए है लेकिन यहां के हुक्मरानो और अलमबरदारो की स्वार्थ और आदूरदर्शी नीतियों की वजह से, आज भी दो वक्त की रोटी के जूगाड़ में जिंदगी से जद्दोजहद कर रहे है । उनकी जिंदगी कब खुशगवार होगी ये तो मालूम नहीं । लेकिन उम्मीद करता हूं जागरूकता का सेवरा उनके आंगन में भी दस्तक देंगा।



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