Wednesday, 16 March 2011

जापान का ये जलजला




तबाही के इस मंजर ने ना जाने कितनो का बसेरा छीना ।
माँ को बेटे से ,तो पिता को बेटी से छीना।।

लाशो के इस मंजर में कौन किसपर लिपट कर सोया होगा ।
बैचेन और तड़पती आँखे वहां अपनो को ढंढती होगी।।

गम आँसू , रूदन का ही वहां बज़ार लगा होगा ।
कोई खुदा की मर्जी तो कोई लौटने का दिलसा देता होगा।।

दुनिया इस मंजर को भयंकर त्रासदी का नाम देंगी ।
नई पीढियों को इसकी कहानियां सुनाई देंगी।।

मौत का ये मंजर अब इतिहास के पन्नो में समां जायेंगी।
वक्त का चादर इसे भूला देने को मजबूर करेंगा ।।

Saturday, 26 February 2011

हमारा टेलीविजन

जरा सोचिए, ज्यादा नहीं आज से देढ दशक पहले हमारी टेलीविजन की दुनिया कहां थी। अगर आपने सोच लिया हो तो, आपकी आंखो में इक्का दुक्का चैनलो की तस्वीर ही उभरती होगी, दूरदर्शन जी टीवी वैगरह -वैगरह। पर अभी अपने घर में मौजूद टीवी सेट की रिमोट खंखाले तो सैकड़ों चैनलो के सुची हाजिर हो जायेंगी। मुझे याद है वो दिन जब दूरदर्शन पर रविवार को दिखाए जाने वाला चित्रहार और शाम को फिल्म देखने के लिए घंटो इंतज़ार करना पड़ता था। पिक्चर गाना कैसा भी हो, पर देखने की ललक और लालसा कम होने का नाम नहीं लेती थी। कोई भी एपिसोड बेहद लजीज दिखता था और देखने की तड़प हरवक्त जिंदा रहती थी। मम्मी पापा की कितनी चैतावनियां, डांट, फटकार को भी ताक पर रखकर , देखने का जूनुन कम नहीं होता था। मानो जिंदगी का फलसफा, उस टेलीविजन के पर्दे में ही समां गया हो....गुजरे जमाने के वो बाते वक्त की धुंध में गुम तो नहीं हो पायेंगे, पर इसकी यादो का कारवां त उम्र साथ चलेंगा। दरअसल चैनलो
की बाढ में अब मुसिबत ये है कि कौन सा चैनल देखा जाए पिक्चर, गाने और न्यूज के कईयो चैनल मौजूद है। जो चौबिस घंटे चिखते चिल्लाते है....चारो पहर उनकी बकबक, गपशप की आवाजे गल्ली मुह्ल्लो और उंची उंची इमारतो में सुनाई पड़ती है। इनका शोर तले सन्नाटा अब तलाश करने की ज़रूरत महसूस होने लगी है। इसके साथ ही चिंता वाली बात ये है कि जो भारतीय समाज पर्दे के दायरे में रह कर अपना जीवन गुज़र बसर करता था, वही इन चैनलो को ज़रिए पश्चिमी देशो की अंधाधुध नकल का पर्याय बनता जा रहा है। चैनलो में दिखाए जाने वाले धारावाहिक हमे मंनोरजन तो मुहैया करा रहे लेकिन हमारे कुटुंबो को एकल परिवारो में भी तब्दील कर रहे है। पहले भी सास बहु की लड़ाईयो घर के चारदिवारी में सुनाई पड़ती थी, पर आज इसकी गुंज सड़क और थाने के चौकियों में भी सुनाई पड़ती है। इसके चलते समाजिक तानाबाना, संस्कृति और हमारी भाषा भी चरमरायी है। फक्र, आनबान, शान ओ शोकत की दीवार भी जर्जर हुई है। कोई शक ओ सुबह नहीं है कि चैनलो ने लोगो को जागरूक किया, उनके ख्वाबो को हकीकत में बदलने की तरकीब सुझाई, उनके हक हकूक की बात बतायी, देश दुनिया की तमाम जानकारियां परोसी, हुकूमत की गड़बड़ियों को उजागर किया। लेकिन इसके साथ ही नंगापन, ग्लैमर और गंदे गानो की ऐसी बयार भी बहायी है। जिसके मोहपाश में छोटे छोटे बच्चे भी आ गये है। फूहड़ता सारी हदो को लांघने की दहलीज पर आ खड़ा है। इसका उदाहरण हाल ही में ख़त्म हुए बीग बॉस को कौन भूल सकता है, पाकिस्तानी अभिनेत्री वीणा मलिक और अश्मित पटेल के बीच पनपे प्यार और कामुक दृश्यो ने गली मुहल्लो तक चर्चाओ से मुहाल कर दिया । लगता है इस तरह के प्रोग्राम बाज़ार के दबाव में टीवी को और फूहड़ता की दुनिया में ले जाना चाहती है । इसके साथ ही सवाल ये भी उभरता है कि क्या बाज़ार का दबाव टीवी पर और बढेगा। और इस प्रेशर की वजह से क्या टीवी में और नंगेपन आय़ेगा । फिलहाल मुझे तो इसका समाधान क्या होंगा मालूम नहीं है । लेकिन उम्मीद है दर्शक ही इसका हल निकालेंगे और माकूल जवाब देंगे।

Thursday, 24 February 2011

काला धन काले लोग

मुझे याद है , काले धन की बात मैं पिछले एक दशक के ज्यादा वक्त से सुन रहा हूं। मेरे कान इसकी चर्चाए सुनते सुनते पक गये है। छोट था तो अकसर बड़े बुजर्गो की जुबान पर ये बात चढी रहती थी कि स्विस बैंको में हमारे बाबुओ,हुक्मरानो और उनके अलमबरदारो का इतना पैसा जमा है जिससे कई महीनो तक पूरे भारत के लोगो को खिलया जा सकता है। रह रह कर न जाने इसे लाने की कितनी मुहीम और उम्मीद की मशाले जलाई गई और न जाने कितनी सियासी रंग चढे ।एकबार फिर इसे लेकर चर्चाओ का बाज़र गर्म है, हमारी हूकुमते इस काली कमाई को लाने की बात कह रही है। लेकिन सीधा सा सवाल है कि क्या विदेशी बैंको में जमा ये काला धन वापस आयेगा।यह फिर हर बार की तरह इसका शोर थम जायेंगा। हमारी आजादी के छह दशक गुज़र जाने के बाद भी अंकूत संपती की चाह मे भ्रष्टाचार की ये गंगा लगातार मैली ही होती जा रही है। ईमानदारी से कहा जाए तो इसकी सफाई करने की जहमत अभी तक किसी भी पार्टी ने नहीं दिखाई है।यह मुद्दा आज भी कूड़ा करकट ही बना हुआ है। हां नेताओ के थोथे वादे, फिजूल की बयानबाजी और वोट की सियासी खेल इस मुद्दे को लेकर आज भी जारी है। इस अंधियाले में उम्मीद की लौ जलाना बेमानी लगने लगी है। मुझे याद है बीजेपी के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार लालकष्ण आडवाणी ने काले धन के इस मुद्दे को जोर शोर से उठाया था। पर वे ये क्यों भूल गये कि केंद्र में उनकी भी सरकार काबिज रही थी, उस वक्त उन्हें ये बाते क्यों याद नहीं आई। खैर इनकी बात छोड़िए दिल्ली के सत्ता में काबिज कांग्रेस पार्टी ने ही अभी तक क्या किया? आखिर वो इस मसले पर क्यों खुलकर नहीं बोल रही है? बिल्कुल उनकी ये चुप्पी शंका पैदा करती है। ये सत्तानायक शायद ये भूल रहे है कि दिल्ली की सियासी गलियारो से दूर , देश के दूर दराज के इलाको में बसा अवाम उनकी सारी हरकतो पर अब नज़र बनाये हुए है। वो सबकुछ देख सुन रहा है, उनका दिल और दिमाग पहले की तुलना में अब कही ज्यादा सक्रिय़ है। जो अभी सब्र बांधे हुए है। इसका माकूल जवाब देने के लिए वो वक्त का इंतज़ार कर रहा है। हम सभी को मालूम है कि रावण , कंस , हिरणाकश्यप पर जब अकूत सपति, लालच और अंहकार का नशा चढा था तो उसका क्या हश्र हुआ हुआ ।बताने की शायद ज़रूरत पड़े। उनके सम्राज्य को अस्त होते सूरज को कोई नहीं बचा पाया। उनकी ये त्रासदी इतिहास का हिस्सा बन गई। हमारे सत्तानायको , हुक्मरानो, सियासतदारो को इस अतीती के किस्से से सबक लेने की ज़रूरत है। नहीं तो एक दिन उन्हें भी लालच लील जायेंगा।

Wednesday, 23 February 2011

आज भी वहीं खड़ा है झारखंड






इक्कसवी सदी का पहला दशक खत्म करने के बाद , जनवरी महीने में अपने घर झारखंड गया...लंबा सफर तय करने के बाद तकरीबन आठ महीने बाद अपने घर पहुंचने पर बेहद अच्छा महसूस कर रहा था । पर दिल में जो ख्वाहिशे लेकर आया था , वो यहां आकर डर और भविष्य की चिंताओ में तब्दील हो गई। घर में सूकुन के पल गुजारने के दौरान जो मेरी आखो ने देखा, वो बेहद दर्दनाक और दिल को चोट पहुंचाने वाला रहा । उस कड़कड़ाती ठंढ की सुबह में कभी नहीं भूल सकता। उसकी यादे दिल को कचोटती है और कहती है क्या जिंदगी वाकई इतनी कठीन है। सुबह सुबह में घर के बाहर दरवाजे से निकला ही था कि , सर्दी में दो मासूम बच्चे , जिनकी उम्र लगभग
बाहर तेरह साल की रही होगी...उनका मासूम चैहरा , कटकटाते दांते , बदन पर पतली से कमीज और बोलती आंखे सर्दी की कहानी सबकुछ बंया कर रही थी । वो बोलने में हिचक रहे थे, तो मैने ही बोलने की जहमत उठायी,। उन बच्चो ने कहा कि वो स्वेटर और साल लेने आए है। जो मेरी माँ ने उनसे देने का वादा किया था । स्वेटर , साल मिलने के बाद उनके चैहरे की चमक देखने वाली थी। माँ से पूछा तो मालूम पड़ा इनके पिता पास के ही मोड़ पर पान की गुमटी है....जिनके भरोसे ही उनकी जिंदगी गुजर बसर होती है। उनके पास इतना पैसा नहीं वो इन बच्चो को तालिम दे सके और ठीक ढंग से परवरिश कर सके। सुबह इन बच्चो से वास्ता हुआ तो शाम दो आदिवासी बच्चो से मुलकात हुई। जिनका इस दुनिया मे कोई नहीं है। ये दोनो भाई अनाथ है। इन दोनो भाईयो की कहानी भी दिल को रूलाने वाली थी। तेरह चौहद साल के ये बच्चे उम्र से पहले जवान हो गये थे। बस दो वक्त की रोटी की जुगा़ड़ के लिए। पूछने पर मालूम पड़ा कि इनके माँ बाप इस दुनिया में नहीं है। साल भर पहले बिमारी से इनकी मौत हो गई थी । इन दोनो भाईयो का कहना था कि
उनकी जिंदगी बचाई जा सकती थी, लेकिन पैसो की किल्लत ने उन्हें वक्त से पहले काल के गाल में समाना पड़ा। इन दोनो भाईयो में बड़ा भाई ट्रक में हेल्पर और छोटा रोज मज़दूरी करके अपनी जिंदगी बसर करता है। इन बच्चो से मिलने के बाद , मै अंदर से बेहद उदास महसूस कर रहा था, शायद इनके लिए कुछ कर पाता । हालांकि इन उदासियों के बीच मेरे जहन में बार बार सवाल भी उठ रहा था कि इन बच्चो के अंधियाले भविष्य के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या सरकारे, इनके
लिए बनाई गई तमाम कमिटिया , कल्याण मंत्रालय , एनजीओ महज कागजो में ही काम कर रही है। क्या इसके बनने के एक दशक गुज़र जाने के बावजूद , इस राज्य के जमीनी हालात में तब्दीलियां नहीं आय़ेंगी ,,,क्या इस राज्य की हथेली में तकदीर बदलने की रेखाए ही नहीं बनी। सोच कर दिल पसिजता है लेकिन पीछे झांकता हुं तो फिर वही गुप्प अंधेरा ही नज़र आता है। हु्क्मरानो के के करोड़ो अरबो के घोटाले, अपने फायदे के लिए बनाई बिगाड़ी गई सरकारे और भ्रष्टाचार की लगातर मैली होती गंगा में फंसते अफसर नेताओ की कतारे । दरअसल ये ऐसे किस्से है जो जिनपर लगाम लगाने की बजाए , इसका सूची लंबी ही होती जा रही है। दुनिया झारखंड के बारे में काफी कुछ पढ सुन रखा है। घपले घोटले, गरीबी, समाजिक कुरितियां से भरे पड़े अखबार और टीवी चैनलो के सहारे उन्हें ये खबरे देखने सुनने को मिलते है। पर तल्ख हकीकत यही है कि यहां के लौग बहुत सीधी साधे , भोले भाले और नीरीह है। झारखंड में शहरो के अलवा उन सूदुर गांवो और जंगलो में भी नीरीह लोग बसते है। जो खुशगवार जिंदगी जिदंगी जिने की अभी भी ख्वाहिश पाले हुए है लेकिन यहां के हुक्मरानो और अलमबरदारो की स्वार्थ और आदूरदर्शी नीतियों की वजह से, आज भी दो वक्त की रोटी के जूगाड़ में जिंदगी से जद्दोजहद कर रहे है । उनकी जिंदगी कब खुशगवार होगी ये तो मालूम नहीं । लेकिन उम्मीद करता हूं जागरूकता का सेवरा उनके आंगन में भी दस्तक देंगा।

Monday, 21 February 2011

आरूषी+नीरूपमा = कातिल कौन ?






एक थी आरूषी और एक थी निरूपमा, इनकी मौत की खबरे अभी भी अखबारो और न्यूज चैनलो मे
देखने -सुनने को मिलती रहती है...दिल को दहला देने वाली ये मैत आज भी लौगो के बदन पर सिहरन पैदा करती है। दरअसल इनके मौत का असली कातिल कौन है। ये सवाल उलझे हुए धागें
के मानिंद आज भी उलझे हुए है। दिल्ली में रहने वाली स्कुली छात्रा आरूषी, जिसने जिंदगी से उम्मीदे, उमंग, उल्लास की ख्वाहिशे पाली थी। इन नन्ही सी प्यारी सी बच्ची की आंखो इन बातो को बखूबी बंया करती थी....यकायक बेदर्दी से की गयी उसकी हत्या ने उसके सारे सपने बिखेर दिए। देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई ने भी इस बच्ची के कातिल को पकड़ने में मजबूर और नाकाम दिखई पड़ी। उसने अपने हाथ खड़े कर दिए। अपनी क्लोजर रिपोर्ट में उसने हत्या का शक आरूषी के मम्मी पापा राजेश और नुपूर तलवार पर ही जता डाला। वही झारखंड के कोडरमा की रहने वाली नीरूपमा पाठक पेशे से पत्रकार थी, दिल्ली में वो बिजनेस अखबार के लिए काम करती थी, नीरूपमा का कसूर महज इतना था कि उसने अलग जाति के लड़के से प्यार किया। खामिजया उसे जान गंवाकार इसकी कीमत चुकानी पड़ी। नीरूपमा की मौत पर भी रूढीवादी मानसिकता की चादर औढे, उसके परिवार वालो पर गया, लेकिन असली कातिल कौन है, यह अभी भी पहेली बनी हुई है । अभी तक न तो कातिल न तो आरूषी का मिला और न निरूपमा का। निरूपमा मामले में ऑनर किलिंग से इंकार नहीं किया जा सकता। पर सवाल जहन में उभरता कि आखिर कातिल कौन है....क्या कानून के हाथ इन मासूमो के ह्तयारो तक कभी नहीं पहुंचेंगे। इस पर पर्दा क्या यूहीं पड़ा रहेंगा या फिर हमारी जांच एजेंसिया कातिल को ढूंढने में नकाबिल है। इस मामले में कानून की जांच और किंतु परंतु की बजाए परिवारों के बीच आपसी विसंगतियां झूठी
शान शोकत और रूतबा ज्यादा दिखाई पड़ता है.। जो इन बेटियों को वक्त से पहले मौत की आगोश में ले गये। बार बार चैनलो के हल्ला करने और अखबारो के हैडलाइंस से आऱूषी और निरूपमा के हत्यारो को पकड़ने की मुहिम में ताकत मिलती है....देश का आम आदमी भी सड़क पर इसके गुनहगारो को जंजीरो में जकड़वाने में बेताब दिखता है। पर तल्ख हकीकत यही है की आरूषी यदी दिल्ली के उंचे खानदान से नाता नहीं रखती, नीरूपमा दिल्ली की प्रतिष्ठित अखबार की पत्रकार नहीं होती, तो शायद ही उनकी मौत पर इतने बवाल , उबाल और सवाल उठते। और न हीं इंडिया गेट में मोमबतियां जलाने के लिए गर्मजोशी से लोगो को हूजुम उमड़ता। राजधानी से हज़ारो किलोमिटर दूर गांवो में अभी भी कितनी आरूषी और नीरूपमा की निर्मम ह्त्या की जा रही है। लेकिन इसपर
कोई भी शोर नहीं मचाता, मीडिया को भी इसकी खोजख़बर लेने की परवाह नहीं। और न पुलिस
प्रशासन , हमारे हुक्मरान और न ही आम आदमी को इससे सरोकार रखने की दिलचस्पी है। वक्त
ने कई भंयकर त्रासदियों को लील लिया और अबूझ पहेली बनाकर छोड़ दिया। कितनी मौत आज भी रहस्त की चादर ओढे हुए है, उनके मुकदमे की फाइल आज भी कचहरी में यू ही न्याय के इंतजार में धूल फांक रही है, कितने गवाह काल के गाल में समा गये, पर कातिल कौन है आज भी
इसकी तलाश जारी है...क्या यह काले अतीत का किस्सा आरूषी और निरूपमा पर भी दुहराया जायेंगा। सोच कर डर लगता है,काश ऐसा न हो, उनके कातिलो को कड़ी से कड़ी सजा मिले, ताकि फिर इन बच्चियों को मारने की हिम्मत और हिमाकत कोई दरिंदा न करे....उम्मीद है इन निर्दोष बेटियों की मौत से इस वतन की हज़ारो आरूषियों और निरूपमा की जिंदगी बचेगी। और उनके खुशगवार जीवन की राह बनायेंगी।